महाशिवरात्रि पर 5 शुभ मंत्र : जानिए शिवलिंग पूजन और व्रत की महिमा का अद्भुत लाभ

“ॐ नमः शिवाय”

महाशिवरात्रि: महत्त्व, कथा, पूजन विधि, मंत्र, लाभ और भगवान शिव की विशेष कथाएँ

महाशिवरात्रि क्यों मनाई जाती है?

महाशिवरात्रि हिन्दू धर्म का प्रमुख पर्व है, जिसे भगवान शिव की आराधना और उपासना के रूप में मनाया जाता है। इस दिन का विशेष महत्व इसलिए है क्योंकि इसे भगवान शिव के अनंत और अविनाशी स्वरूप की पूजा के रूप में मनाया जाता है। पुराणों के अनुसार, महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव शिवलिंग के रूप में प्रकट हुए थे।

इस दिन भगवान शिव और देवी पार्वती का विवाह भी हुआ था, इसलिए इसे शिव और शक्ति के मिलन का पर्व भी कहा जाता है। महाशिवरात्रि को शिव-पार्वती के विवाह के दिन के रूप में भी विशेष मान्यता प्राप्त है। भक्त इस दिन शिव जी की पूजा करते हैं और उनसे अपने कष्टों से मुक्ति की कामना करते हैं। इस दिन शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र आदि अर्पित करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है।

महाशिवरात्रि शिवजी


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महाशिवरात्रि का महत्त्व

महाशिवरात्रि का धार्मिक, आध्यात्मिक और ज्योतिषीय महत्व है। इसे भगवान शिव की आराधना का सबसे महत्वपूर्ण दिन माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन व्रत, उपवास, और ध्यान करने से जीवन के सभी कष्टों से मुक्ति मिलती है और व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है। महाशिवरात्रि की रात को शिवलिंग पर जल, दूध और बेलपत्र चढ़ाने से व्यक्ति के सारे पाप धुल जाते हैं और उसे भगवान शिव की कृपा और शिवलोक की प्राप्ति होती है।

ज्योतिषीय दृष्टि से भी महाशिवरात्रि का दिन विशेष होता है। इस दिन ग्रहों की स्थिति ऐसी होती है कि ध्यान और साधना से व्यक्ति की आंतरिक शक्ति जागृत होती है। महाशिवरात्रि पर की गई साधना से आध्यात्मिक उन्नति होती है और मानसिक शांति प्राप्त होती है।

महाशिवरात्रि शिवजी1

महाशिवरात्रि की तिथि और समय

महाशिवरात्रि फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाई जाती है। यह तिथि हिन्दू पंचांग के अनुसार फरवरी और मार्च के बीच आती है। महाशिवरात्रि की पूजा का शुभ समय रात को चार पहरों में होता है। यह दिन विशेष रूप से रात्रिकाल में शिवजी की उपासना के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। रात्रि के चार पहरों में शिवलिंग का अभिषेक कर भगवान शिव की आराधना करनी चाहिए।

व्रत करने वाले भक्त दिनभर उपवास रखते हैं और रातभर जागरण करते हैं। इस दिन बेलपत्र, धतूरा, आक, दूध, दही और पंचामृत से शिवलिंग की पूजा की जाती है। पूजा का सही समय रात को मध्य रात्रि के आसपास होता है, जब शिवजी का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है।

शिवलिंग रूप में अवतरण की कथा

पुराणों के अनुसार, महाशिवरात्रि की रात भगवान शिव ने शिवलिंग के रूप में प्रकट होकर सृष्टि का सृजन, पालन और संहार करने का संकल्प लिया था। शिवलिंग भगवान शिव के अनंत और निराकार स्वरूप का प्रतीक है, जो यह दर्शाता है कि शिवजी का स्वरूप जन्म और मृत्यु से परे है। शिवलिंग की पूजा के माध्यम से भक्त भगवान शिव के इस अद्वितीय और अनंत स्वरूप की उपासना करते हैं।

यह कथा बताती है कि सृष्टि के सभी तत्त्व भगवान शिव के भीतर समाहित हैं, और उनकी आराधना से मनुष्य को जीवन के सभी कष्टों से मुक्ति मिलती है। शिवलिंग की पूजा करने से व्यक्ति को जीवन में सुख-समृद्धि प्राप्त होती है और उसके सभी दुखों का अंत होता है।

महाशिवरात्रि शिवजी

शिव जी के विवाह की कथा

महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था। यह कथा बहुत प्रसिद्ध है। देवी पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। शिवपुराण के अनुसार, माता पार्वती ने अपनी कठिन तपस्या से भगवान शिव को प्रसन्न किया और उन्हें अपने पति रूप में स्वीकार किया।

इस कथा के अनुसार, शिवजी ने माता सती के अग्नि में जल जाने के बाद, गहन तपस्या की थी। देवी पार्वती ने शिवजी को पुनः प्राप्त करने के लिए जन्म लिया और अपने तप से उन्हें प्रसन्न किया। महाशिवरात्रि का यह दिन शिव-पार्वती के पवित्र मिलन का प्रतीक है। इसलिए इस दिन को विशेष रूप से विवाहित जोड़ों और उन लोगों के लिए विशेष फलदायी माना जाता है, जो सुखी दांपत्य जीवन की कामना करते हैं।

"ॐ नमः शिवाय"

महाशिवरात्रि की पूजा विधि

महाशिवरात्रि के दिन चार प्रहर की पूजा करना अत्यधिक शुभ माना जाता है। पूजा की प्रक्रिया को सादगी से और पूर्ण निष्ठा के साथ करना चाहिए। शिवलिंग की पूजा इस दिन विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण मानी जाती है। पूजा विधि निम्नलिखित है:

  1. स्नान एवं शुद्धिकरण: प्रातःकाल गंगा जल या शुद्ध जल से स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  2. पूजा स्थल की तैयारी: शिवलिंग को शुद्ध जल से धोकर साफ करें और उस पर गंगा जल चढ़ाएं।
  3. शिवलिंग अभिषेक: शिवलिंग पर पंचामृत (दूध, दही, घी, शक्कर,शहद, और शुद्ध जल) से अभिषेक करें। इसके बाद भस्म से शिवलिंग को सजाएं, चंदन और पुष्प चढ़ाएं।
  4. बेलपत्र अर्पण: शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाना अत्यंत शुभ माना जाता है। यह भगवान शिव का प्रिय पत्र है।
  5. धतूरा और आक: धतूरा और आक के पुष्प शिव जी को चढ़ाएं, क्योंकि ये उनके प्रिय हैं।
  6. मंत्र जाप: शिव जी का ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का जाप करते रहें। इस मंत्र का नियमित जाप करने से मन और आत्मा की शुद्धि होती है।
  7. धूप, दीप और अगरबत्ती: शिवलिंग के सामने धूप, दीप और अगरबत्ती जलाकर भगवान शिव की आरती करें।
  8. नैवेद्य: भगवान शिव को फल, मिठाई, पंचामृत और जल अर्पित करें।
  9. ध्यान और ध्यान योग: भगवान शिव का ध्यान करें, उनके ध्यान में योग मुद्रा में बैठें और ध्यान लगाएं।

पूजन के बाद, शिव जी से सुख-समृद्धि की कामना करें।

महाशिवरात्रि शिवजी

शिव पूजन सामग्री

महाशिवरात्रि की पूजा के लिए आवश्यक सामग्री निम्नलिखित है:

  1. गंगा जल या शुद्ध जल
  2. पंचामृत (दूध, दही, घी, शक्कर, शहद, और जल)
  3. बेलपत्र
  4. धतूरा और आक
  5. चंदन और अक्षत (चावल)
  6. फूल (विशेष रूप से सफेद पुष्प)
  7. धूप, दीप और अगरबत्ती
  8. फल और मिठाई
  9. भस्म (शिव जी को प्रिय भस्म)

महाशिवरात्रि की पूजा का सही समय

महाशिवरात्रि की पूजा रातभर की जाती है, जिसमें चार पहरों में पूजा करना अत्यंत शुभ माना जाता है। प्रत्येक प्रहर में शिवलिंग का अभिषेक करें और भगवान शिव की आराधना करें। पूजा का सही समय रात्रि 12 बजे से लेकर सुबह तक होता है। विशेष रूप से मध्यरात्रि के समय शिवलिंग पर अभिषेक और बेलपत्र चढ़ाने से अत्यधिक पुण्य की प्राप्ति होती है।
इस दौरान मंत्र जाप, ध्यान और आराधना से भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

महाशिवरात्रि के लाभ

महाशिवरात्रि का व्रत और पूजा कई लाभ प्रदान करते हैं:

  1. मोक्ष की प्राप्ति: महाशिवरात्रि पर व्रत और पूजा करने से व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है और उसके पापों का नाश होता है।
  2. स्वास्थ्य लाभ: शिवलिंग पर अभिषेक करने से व्यक्ति के स्वास्थ्य में सुधार होता है और दीर्घायु की प्राप्ति होती है।
  3. आध्यात्मिक उन्नति: इस दिन ध्यान और साधना करने से व्यक्ति की आध्यात्मिक उन्नति होती है।
  4. मानसिक शांति: भगवान शिव की पूजा से व्यक्ति के मन को शांति और सुकून मिलता है।
  5. विवाहिक सुख: महाशिवरात्रि के दिन शिव-पार्वती की पूजा करने से विवाहित जीवन में सुख और समृद्धि आती है।
  6. सकारात्मक ऊर्जा का संचार: इस दिन पूजा और ध्यान से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
महाशिवरात्रि शिवजी

महाशिवरात्रि के प्रमुख मंत्र

महाशिवरात्रि के दिन मंत्रों का जाप अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इन मंत्रों के जाप से भगवान शिव की कृपा शीघ्र प्राप्त होती है। कुछ प्रमुख मंत्र इस प्रकार हैं:

1. ॐ नमः शिवाय:

“ॐ नमः शिवाय” यह भगवान शिव का मूल मंत्र है, जो ध्यान और पूजा के समय जपा जाता है।

2. महामृत्युंजय मंत्र

ॐ हौं जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः

“ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।

उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥”

ॐ स्वः भुवः भूः ॐ सः जूं हौं ॐ।

इस मंत्र का जाप दीर्घायु, स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए किया जाता है। यह मंत्र जीवन में आने वाली हर प्रकार की समस्याओं को दूर करने और दीर्घायु प्राप्ति के लिए अत्यधिक फलदायी माना गया है।

3.     रुद्र गायत्री मंत्र:


“ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि।
तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥”

इस मंत्र का जाप करने से व्यक्ति की मानसिक और आध्यात्मिक उन्नति होती है। यह मंत्र भगवान शिव की शक्ति और उनकी कृपा को प्राप्त करने के लिए अत्यंत प्रभावी है।

महाशिवरात्रि शिवजी

4. श्रीशिवपंचाक्षरस्तोत्रं


“इस स्तोत्र के पाँचों श्लोकों में क्रमशः न, म, शि, वा और य है अर्थात् नम: शिवाय। यह पूरा स्तोत्र शिवस्वरूप है। इस मंत्र के रचयिता श्री आदि शंकराचार्य जी हैं।

“नागेंद्रहाराय त्रिलोचनाय भस्मांगरागाय महेश्वराय।

नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय तस्मै “न” काराय नमः शिवाय॥

मंदाकिनी सलिल चंदन चर्चिताय नंदीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय।

मंदारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय तस्मै “म” काराय नमः शिवाय॥

शिवाय गौरी वदनाब्जवृंद सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय।

श्री नीलकण्ठाय वृषध्वजाय तस्मै “शि” काराय नमः शिवाय॥

वसिष्ठ कुम्भोद्भव गौतमार्य मुनींद्र देवार्चित शेखराय।

चंद्रार्क वैश्वानर लोचनाय तस्मै “व” काराय नमः शिवाय॥

यक्षस्वरूपाय जटाधराय पिनाकहस्ताय सनातनाय।

दिव्याय देवाय दिगम्बराय तस्मै “य” काराय नमः शिवाय॥

पंचाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेत् शिव सन्निधौ।

शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते॥”

॥ इति श्रीमच्छंकराचार्यविरचितं श्रीशिवपंचाक्षरस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

भावार्थ : हे महेश्वर! आप नागराज को हार स्वरूप धारण करने वाले हैं। हे (तीन नेत्रों वाले) त्रिलोचन, आप भस्म से अलंकृत, नित्य (अनादि एवं अनंत) एवं शुद्ध हैं। अम्बर को वस्त्र समान धारण करने वाले दिगम्बर शिव, आपके ‘न’ अक्षर द्वारा जाने वाले स्वरूप को नमस्कार है।

चन्दन से अलंकृत, एवं गंगा की धारा द्वारा शोभायमान, नन्दीश्वर एवं प्रमथनाथ के स्वामी महेश्वर आप सदा मन्दार एवं बहुदा अन्य स्रोतों से प्राप्त पुष्पों द्वारा पूजित हैं। हे शिव, आपके ‘म’ अक्षर द्वारा जाने वाले रूप को नमन है।

हे धर्मध्वजधारी, नीलकण्ठ, शि अक्षर द्वारा जाने जाने वाले महाप्रभु, आपने ही दक्ष के दम्भ यज्ञ का विनाश किया था। माँ गौरी के मुखकमल को सूर्य समान तेज प्रदान करने वाले शिव, आपके ‘शि’ अक्षर से ज्ञात रूप को नमस्कार है।

देवगण एवं वसिष्ठ , अगस्त्य, गौतम आदि मुनियों द्वारा पूजित देवाधिदेव! सूर्य, चन्द्रमा एवं अग्नि आपके तीन नेत्र समान हैं। हे शिव !! आपके ‘व’ अक्षर द्वारा विदित स्वरूप को नमस्कार है।

हे यक्ष स्वरूप, जटाधारी शिव आप आदि, मध्य एवं अंत रहित सनातन हैं। हे दिव्य चिदाकाश रूपी अम्बर धारी शिव !! आपके ‘य’ अक्षर द्वारा जाने जाने वाले स्वरूप को नमस्कार है।

जो कोई भगवान शिव के इस पंचाक्षर मंत्र का नित्य उनके समक्ष पाठ करता है वह शिव के पुण्य लोक को प्राप्त करता है तथा शिव के साथ सुखपूर्वक निवास करता है।

यह मंत्र भगवान शिव की विशेष स्तुति करता है और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए इसका जाप बहुत लाभकारी माना जाता है।

5.      श्री शिवाय नमस्तुभ्यं :


भगवान् शिव को समर्पित शिव महापुराण के 23वें अध्याय के 7वें श्लोक में श्री शिवाय नमस्तुभ्यं महामंत्र का वर्णन मिलता है जो इस प्रकार है।

“श्री शिवाय नमस्तुभ्यं”

यह छोटा लेकिन प्रभावी मंत्र भगवान शिव की कृपा पाने के लिए जपा जाता है। इसे नियमित रूप से जपने से जीवन में सकारात्मकता आती है। श्री शिवाय नमस्तुभ्यं मंत्र का जाप सिद्धि प्रदान करने वाला होता है।

महाशिवरात्रि शिवजी

6. श्री शिव रुद्राष्टकम् ” शीघ्र फलदायी स्तोत्र

शिवजी को समर्पित यह स्त्रोत रामचरितमानस से लिया गया है इस स्तोत्र के रचयिता तुलसीदास जी हैं।

॥ अथ रुद्राष्टकम् ॥

नमामीशमीशान निर्वाणरूपम्।
विभुम् व्यापकम् ब्रह्मवेदस्वरूपम्।
निजम् निर्गुणम् निर्विकल्पम् निरीहम्।
चिदाकाशमाकाशवासम् भजेऽहम् ॥१॥

निराकारमोंकार मूलम् तुरीयम्।
गिराज्ञान गोतीतमीशम् गिरीशम्।
करालम् महाकाल कालम् कृपालम्।
गुणागार संसार पारम् नतोऽहम् ॥२॥

तुषाराद्रिसंकाशगौरम् गभीरम्।
मनोभूतकोटि प्रभाश्रीशरीरम्।
स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारुगंगा।
लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजंगा ॥३॥

चलत्कुण्डलम् भ्रूसुनेत्रम् विशालम्।
प्रसन्नाननम् नीलकण्ठम् दयालम्।
मृगाधीश चर्माम्बरम् मुण्डमालम्।
प्रियम् शंकरम् सर्वनाथम् भजामि ॥४॥

प्रचण्डम् प्रकृष्टम् प्रगल्भम् परेशम्।
अखण्डम् अजम् भानुकोटि प्रकाशम्।
त्रयः शूल निर्मूलनम् शूलपाणिम्।
भजेऽहम् भवानीपतिम् भावगम्यम् ॥५॥

कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी।
सदा सज्जनानन्ददाता पुरारि।
चिदानन्द सन्दोह मोहापहारि।
प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारि ॥६॥

न यावद् उमानाथ पादारविन्दम्।
भजन्तीह लोके परे वा नराणाम्।
न तावत्सुखम् शान्ति सन्तापनाशम्।
प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासम् ॥७॥

न जानामि योगम् जपम् नैव पूजाम्।
नतोऽहम् सदा सर्वदा शम्भु तुभ्यम्।
जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानम्।
प्रभो पाहि आपन्नमामीश शम्भो ॥८॥

रुद्राष्टकमिदम् प्रोक्तम् विप्रेण हरतोषये।
ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषाम् शम्भुः प्रसीदति॥

॥ इति श्री रुद्राष्टकम् सम्पूर्णम् ॥

भावार्थ : हे मोक्षस्वरूप, विभु, ब्रह्म और वेदस्वरूप, ईशान दिशा के ईश्वर व सबके स्वामी श्री शिव जी ! मैं आपको नमस्ककरता हूँ। निजस्वरूप में स्थित (अर्थात माया आदि से रहित), गुणों से रहित, भेद रहित, इच्छा रहित, चेतन आकाशरूप एवं आकाश को ही वस्त्र रूप में धारण करने वाले दिगम्बर आपको भजता हूँ।॥१॥

निराकार, ओंकार के मूल, तुरीय (तीनों गुणों से अतीत), वाणी, ज्ञान व इंद्रियों से परे, कैलासपति, विकराल, महाकाल के भी काल, कृपालु, गुणों के धाम, संसार के परे आप परमेश्वर को मैं नमस्कार करता हूँ।॥२॥

जो हिमाचल समान गौरवर्ण व गम्भीर हैं, जिनके शरीर में करोड़ों कामदेवों की ज्योति एवं शोभा है,जिनके सर पर सुंदर नदी गंगा जी विराजमान हैं, जिनके ललाट पर द्वितीय का चंद्रमा और गले में सर्प सुशोभित है।॥३॥

जिनके कानों में कुण्डल हिल रहे हैं, सुंदर भृकुटि व विशाल नेत्र हैं, जो प्रसन्नमुख, नीलकंठ व दयालु हैं, सिंहचर्म धारण किये व मुंडमाल पहने हैं, उनके सबके प्यारे, उन सब के नाथ श्री शंकर को मैं भजता हूँ।॥४॥

प्रचण्ड (रुद्र रूप), श्रेष्ठ, तेजस्वी, परमेश्वर, अखण्ड, अजन्मा, करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाश वाले, तीनों प्रकार के शूलों (दु:खों) को निर्मूल करने वाले, हाथ में त्रिशूल धारण किये, प्रेम के द्वारा प्राप्त होने वाले भवानी के पति श्री शंकर को मैं भजता हूँ।॥५॥

कलाओं से परे, कल्याणस्वरूप, कल्प का अंत(प्रलय) करने वाले, सज्जनों को सदा आनन्द देने वाले, त्रिपुर के शत्रु सच्चिनानंदमन, मोह को हरने वाले, प्रसन्न हों, प्रसन्न हों।॥६॥

हे पार्वती के पति, जबतक मनुष्य आपके चरण कमलों को नहीं भजते, तब तक उन्हें न तो इसलोक में न परलोक में सुख शान्ति मिलती है और न ही तापों का नाश होता है। अत: हे समस्त जीवों के अंदर (हृदय में) निवास करने वाले प्रभो, प्रसन्न होइये।॥७॥

मैं न तो जप जानता हूँ, न तप और न ही पूजा। हे प्रभो, मैं तो सदा सर्वदा आपको ही नमन करता हूँ। हे प्रभो, बुढ़ापा व जन्म [मृत्यु] दु:खों से जलाये हुए मुझ दुखी की दुखों से रक्षा करें। हे ईश्वर, मैं आपको नमस्कार करता हूँ।॥८॥

भगवान रुद्र का यह अष्टक उन शंकर जी की स्तुति के लिये है। जो मनुष्य इसे प्रेमस्वरूप पढ़ते हैं, श्रीशंकर उन से प्रसन्न होते हैं।

महाशिवरात्रि शिवजी

महाशिवरात्रि का व्रत और जागरण

महाशिवरात्रि पर व्रत रखना और रातभर जागरण करना अत्यंत शुभ माना जाता है। व्रत रखने वाले भक्त शिवजी की उपासना और पूजा करते हैं। यह व्रत शरीर और मन की शुद्धि के लिए होता है और व्यक्ति को आत्मिक शांति और आध्यात्मिक जागरूकता प्रदान करता है। इस दिन व्रत रखने से मनुष्य के सारे पाप धुल जाते हैं और उसे भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

व्रत के दौरान कुछ भक्त केवल जल और फल का सेवन करते हैं, जबकि कुछ लोग पूर्ण उपवास रखते हैं। दिनभर उपवास के बाद रात को जागरण करना आवश्यक होता है। जागरण का अर्थ है रातभर भगवान शिव का ध्यान और पूजा करना। रात को शिवलिंग पर जल, दूध और बेलपत्र चढ़ाते हुए भगवान शिव की आराधना करनी चाहिए।
भक्तजन शिवजी के मंत्रों का जाप करते हुए, भजन-कीर्तन करते हैं और शिवलिंग पर जल चढ़ाते हैं। यह रात विशेष रूप से पूजा और ध्यान के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है।

महाशिवरात्रि की चार प्रहर की पूजा का महत्त्व

महाशिवरात्रि के दिन चार पहर की पूजा करना अत्यधिक शुभ माना जाता है। यह पूजा रात्रिकाल में चार अलग-अलग समय पर की जाती है। प्रत्येक पहर में भगवान शिव की विशेष प्रकार से पूजा की जाती है। चार प्रहर की पूजा विधि इस प्रकार है:

1.     पहला प्रहर:


रात के पहले पहर में शिवलिंग पर जल और गंगाजल चढ़ाकर बेलपत्र, धतूरा और चंदन अर्पित किया जाता है। यह प्रारंभिक पूजा भगवान शिव की कृपा को प्राप्त करने के लिए की जाती है।

2.     दूसरा प्रहर:


दूसरे पहर में दूध, दही और शहद से शिवलिंग का अभिषेक किया जाता है और पुष्प चढ़ाए जाते हैं। इस पहर की पूजा से व्यक्ति के पापों का नाश होता है।

3.     तीसरा प्रहर:


तीसरे पहर में घी और शहद से अभिषेक कर चंदन का तिलक लगाते हैं। इस पहर की पूजा से भक्त की आंतरिक शक्तियों का विकास होता है और भगवान शिव का विशेष आशीर्वाद मिलता है।

4.     चौथा प्रहर:


अंतिम प्रहर में पंचामृत से शिवलिंग का अभिषेक कर फल, मिठाई और अन्य नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं। इस पहर की पूजा से भगवान शिव की कृपा से समस्त इच्छाओं की पूर्ति होती है।

हर पहर की पूजा में ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का जाप करना चाहिए और शिव जी की आरती करनी चाहिए। इससे भगवान शिव की कृपा शीघ्र प्राप्त होती है।

महाशिवरात्रि का आध्यात्मिक महत्त्व

महाशिवरात्रि केवल धार्मिक पर्व नहीं है, बल्कि इसका आध्यात्मिक महत्त्व भी है। इस दिन ध्यान और साधना से आत्मिक उन्नति की प्राप्ति होती है। शिवजी का ध्यान करने से व्यक्ति के मन की अशांति दूर होती है और उसे आत्मिक शांति मिलती है। महाशिवरात्रि का पर्व हमें जीवन में संयम, तपस्या और भक्ति का मार्ग दिखाता है।

शिवजी का ध्यान और आराधना व्यक्ति को उसके आंतरिक अस्तित्व से जोड़ती है और उसे जीवन के असली उद्देश्य का बोध कराती है। शिवजी का निराकार और अद्वितीय स्वरूप हमें जीवन में संतुलन और सादगी का संदेश देता है।

महाशिवरात्रि शिवजी

शिव जी की आरती

ॐ जय शिव ओंकारा, प्रभु जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्द्धांगी धारा ॥ ॐ हर हर हर महादेव॥

एकानन चतुरानन पंचानन राजे। शिव पंचानन राजे।
हंसासन गरुड़ासन वृषवाहन साजे ॥ ॐ हर हर हर महादेव.॥

दो भुज चार चतुर्भुज दस भुज अति सोहे।भोले दस भुज अति सोहे।
तीनों रूप निरखते। त्रिभुवन मन मोहे ॥ ॐ हर हर हर महादेव॥

अक्षमाला बनमाला मुण्डमाला धारी। शिव मुण्डमाला धारी।
चंदन मृगमद सोहे, भोले शुभकारी॥ ॐ हर हर हर महादेव॥

श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे। शिव बाघम्बर अंगे।
ब्रह्मादिक सनकादिक भूतादिक संगे ॥ ॐ हर हर हर महादेव॥

कर के मध्य कमंडलु चक्र त्रिशूल धर्ता। शिव कर में त्रिशूल धर्ता।
जगकर्ता जगहर्ता जगपालनकर्ता॥ ॐ हर हर हर महादेव॥

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका। स्वामी जानत अविवेका।
प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका ॥ ॐ हर हर हर महादेव॥

त्रिगुण शिवजी की आरती जो कोई नर गावे। प्रभु प्रेम सहित गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी मनवांछित फल पावे ॥ ॐ हर हर हर महादेव॥

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सारांश

महाशिवरात्रि का पर्व भगवान शिव की अनंत और अविनाशी शक्ति की उपासना का पर्व है। यह दिन हमें जीवन में धर्म, अध्यात्म, और भक्ति का महत्व सिखाता है। इस दिन शिवलिंग की पूजा, उपवास, और मंत्र जाप से व्यक्ति को भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है। महाशिवरात्रि की पूजा विधि, मंत्र, और शिव जी की कथा हमें जीवन में सही दिशा प्रदान करते हैं।
शिवजी के विवाह की कथा, उनके शिवलिंग रूप में अवतरण की कथा और महाशिवरात्रि की पूजा विधि से हम ईश्वर की उपासना और ध्यान से जीवन के सभी कष्टों से मुक्ति पा सकते हैं।

महाशिवरात्रि का यह पावन पर्व हमारे जीवन में शांति, समृद्धि, और मोक्ष प्राप्त करने का मार्ग दिखाता है। भगवान शिव की कृपा से हम जीवन की कठिनाइयों का सामना कर सकते हैं और आत्मिक उन्नति प्राप्त कर सकते हैं। महाशिवरात्रि की पूजा और व्रत से भगवान शिव के आशीर्वाद की प्राप्ति होती है और जीवन में सुख-समृद्धि का संचार होता है।

“ॐ नमः शिवाय” – इस मंत्र का नियमित जाप करें और भगवान शिव की आराधना से अपने जीवन को सफल और आनंदमय बनाएं।

डिस्क्लेमर:
इस ब्लॉग में प्रस्तुत सभी जानकारी महाशिवरात्रि की पूजा, कथा, और धार्मिक मान्यताओं से संबंधित है, जिसका उद्देश्य केवल सामान्य जानकारी प्रदान करना और धार्मिक जागरूकता बढ़ाना है। यह जानकारी विभिन्न पारंपरिक और सांस्कृतिक स्रोतों पर आधारित है, और इसे किसी भी प्रकार की आधिकारिक धार्मिक सलाह के रूप में न समझा जाए। पूजा विधि, मंत्र, व्रत, या अन्य धार्मिक अनुष्ठानों का पालन करने से पहले, पाठकों को सुझाव दिया जाता है कि वे अपने धार्मिक गुरुओं, विशेषज्ञों, या परिवार के वरिष्ठ सदस्यों से परामर्श अवश्य करें। इस ब्लॉग की सामग्री व्यक्तिगत धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भिन्न हो सकती है, और इसका उद्देश्य किसी की धार्मिक भावनाओं को आहत करना नहीं है।

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